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बैंकों की 'सफेदपोश लूट' का बड़ा पर्दाफाश: गरीबों की जेब से उड़ाए ₹19,000 करोड़, संसद में राघव चड्ढा ने खोली पोल!

संसद में बैंकिंग सिस्टम का चौंकाने वाला सच

नई दिल्ली। भारतीय बैंकिंग सेक्टर से एक ऐसा आंकड़ा सामने आया है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। पिछले तीन वित्तीय वर्षों (FY23 से FY25) के दौरान बैंकों ने मिनिमम बैलेंस न रख पाने के नाम पर आम जनता की जेब से ₹19,000 करोड़ से अधिक की वसूली की है। यह खुलासा संसद के पटल पर रखे गए आधिकारिक डेटा के माध्यम से हुआ है।


गरीबी की सजा दे रहे हैं देश के बैंक

आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रखर राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने इस मुद्दे को 'गरीबों की लूट' करार देते हुए संसद में जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि यह जुर्माना किसी बड़े उद्योगपति या डिफॉल्टर से नहीं, बल्कि उस किसान, पेंशनर और दिहाड़ी मजदूर से लिया गया है जो अपनी गाढ़ी कमाई की सुरक्षा के लिए बैंकों पर भरोसा करता है।


पेनल्टी के आंकड़ों का खौफनाक गणित

संसदीय आंकड़ों के मुताबिक, बैंकों ने कुल ₹19,083 करोड़ की पेनल्टी वसूली है, जिसमें प्राइवेट बैंकों का हिस्सा सबसे बड़ा यानी ₹11,000 करोड़ है। वहीं, पब्लिक सेक्टर बैंकों ने लगभग ₹8,000 करोड़ वसूले हैं। सबसे ज्यादा वसूली करने वालों में HDFC Bank (₹3,872 करोड़) और Axis Bank (₹2,706 करोड़) जैसे दिग्गज नाम शीर्ष पर शामिल हैं।


मजबूर खाताधारकों पर मार और मुनाफाखोरी

सांसद राघव चड्ढा ने सदन में भावुक होते हुए कहा कि जब एक पेंशनर दवा के लिए पैसे निकालता है और बैलेंस कम होने पर बैंक जुर्माना काटता है, तो वह उसकी मजबूरी का फायदा उठाना है। उन्होंने सवाल किया कि क्या वित्तीय समावेशन का असली मकसद सिर्फ खाते खोलना था या गरीबों की छोटी-छोटी बचत को कॉर्पोरेट मुनाफे में बदलना था?


राघव चड्ढा की तीखी मांग और प्रस्ताव

संसद में चर्चा के दौरान राघव चड्ढा ने मांग की कि मिनिमम बैलेंस पेनल्टी को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह खत्म किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि जन धन योजना जैसी पहल का उद्देश्य गरीबों को बैंकिंग से जोड़ना था, लेकिन इस तरह की पेनल्टी उन्हें सिस्टम से दूर धकेल रही है और उनकी बचत को 'कानूनी' तरीके से छीन रही है।

बैंकिंग नैतिकता पर खड़े हुए गंभीर सवाल

यह मुद्दा अब केवल राजनीतिक बहस नहीं रह गया है, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आर्थिक गरिमा से जुड़ा है। सवाल यह है कि क्या SBI, HDFC और Axis जैसे बड़े संस्थान गरीबों के चंद रुपयों के बिना नहीं चल सकते? अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस पर कोई ठोस नीतिगत बदलाव लाती है या गरीबों की जेब कटती रहेगी। फोटो सोर्से, साभार


विश्लेषण

"बैंकों द्वारा मिनिमम बैलेंस के नाम पर ₹19,000 करोड़ वसूलना वित्तीय सेवाओं के नाम पर एक अनैतिक कृत्य है। जिस देश में करोड़ों लोग गरीबी रेखा के करीब हों, वहां उनकी छोटी बचत पर जुर्माना लगाना 'वित्तीय समावेशन' के दावों की हवा निकाल देता है। सरकार और RBI को तत्काल हस्तक्षेप कर बैंकिंग को 'जन-केंद्रित' बनाना चाहिए, न कि 'मुनाफा-केंद्रित' लुटेरा तंत्र।" #BankingLoot #MinimumBalance #RaghavChadha #IndianEconomy #FinancialInjustice #PoorVsBanks #ModiGovernment #HDFCBank #AxisBank #SBI #BankingRegulation #RBI #FinanceMinistry #CommonMan #SocialJustice #Hamaraprayas #ParliamentUpdate
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